बुदनी से संजय शर्मा। लकड़ी के बैल बनाकर उन्हें नर्मदा नदी में पहले ने लाया जाता है और फिर पूरी तरीके से रंग रोगन किया जाता है और पूरे गांव और जंगल का भ्रमण कराया जाता है,

लकड़ी के बैलों को पूजन के लिए विशेष तरह के पकवान,
जिसमें ठेठट्रा शकर पारे,पूड़ी, खीर बनाकर भोग लगाया जाता है,

बच्चे और बड़े बूढ़े जंगल में लकड़ी के बने बैलों को जिसे गांव की भाषाओं में गुल्ला बोलते हैं इन्हें जंगल का भ्रमण कराया जाता है और घास तोड़कर खिलाई जाती है तथा घर से बने पकवान भी खिलाए जाते हैं और खुद भी खाते जाते हैं

गांव में साल भर से इंतजार करते हैं इस पोला अमावस्या का महिलाएं भी 1 दिन पहले से तैयारी करती हैं

देश प्रदेश में चारों तरफ हरियाली हो और बहुत ज्यादा मात्रा में अनाज पैदा हो इस पूजन का विशेष रहस्य एक यह भी है,

धीरे-धीरे यह परंपरा खत्म होती जा रही है लेकिन लेकिन बुधनी में आज भी यह परंपरा बड़ी श्रद्धा और भाव से कुछ लोग बनाकर जिंदा रखे हुए हैं भले ही जो लोग पूजन करते हैं उनके पास जमीन थी लेकिन जमीन बिक गई परंतु पूजन आज भी विधि विधान से कई पीढ़ियों से करते चले आ रहे हैं,

कई गांव के लोगों का कहना है कि हम यह परंपरा मरते दम तक जारी रखेंगे क्योंकि हमारी हिंदू संस्कृति है और सरकार को भी इस तरह के आयोजन और परंपराओं को कायम रखने के लिए सहयोग करना चाहिए।

Mukesh Mehta
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