सीहोर। शहर के बाल विहार मैदान पर जारी 1008 मज्जिनेंद्र पंच कल्याणक प्रतिष्ठा महा महोत्सव एवं विश्व शान्ति महायज्ञ में गुरुवार को सुबह भगवान 1008 आदिनाथ का मोक्ष कल्याणक विधि-विधान से मुनि श्री संस्कार सागर महाराज के सानिध्य में अनुष्ठान सपन्न किया गया, इसके पश्चात धर्मसभा, मुनि श्री के प्रवचन एवं प्रतिष्ठाचार्य बाल ब्रह्मचारी धीरज भैया, सुमत भैया, शोभित भैया और संजय भैया का समाजजनों ने सम्मान किया। दोपहर में भव्य शोभा यात्रा अनुष्ठान स्थल से निकाली गई। भव्य शोभा यात्रा का शहर के अनेक स्थानों पर समाजसेवी संगठनों, जनप्रतिनिधियों और शहरवासियों ने पुष्प वर्षा कर स्वागत किया। शोभा यात्रा में महिलाएं और पुरुष परम्पारिक परिधान में आगे-आगे चल रहे थे, वहीं जबलपुर के प्रसिद्ध श्याम बैँड पर भजन आदि आकर्षण का केन्द्र रहे।
गुरुवार को भगवान का मोक्ष कल्याणक जैन समाज के तत्वाधान में मनाया गया। इस दौरान विधान का आयोजन किया गया। भगवान का पूजन कर भगवान को निर्वाण लाडू समर्पित किया गया। शोभायात्रा निकाली। इसमें 51 महापात्र के रूप में बग्गी पर सवार होकर चल रहे थे साथ ही 71 इंद्र-इंद्राणी और अष्ट कुमारी थी शोभायात्रा में शामिल थी, शहर के प्रमुख मार्गों से होती हुई शहर के छावनी चरखा लाइन स्थित मंदिर पहुंची। शहर के बाल विहार मैदान पर जारी छह दिवसीय महोत्सव समापन किया गया। इस पावन अवसर पर सुबह छह बजे मंगलाष्टक, दिग्बंधन, पात्र शुद्धि, अभिषेक, शांतिधारा, नित्यमह पूजन आदि का विधि-विधान से अनुष्ठान किया। इसके अलावा सुबह सवा सात बजे प्रभु का मोक्ष गमन, अंतिम दर्शन, मोक्ष कल्याणक पूजन, निर्वाण लाडू आदि। वहीं सुबह नौ बजे मुनि श्री की मंगल देशना, विश्वशांति महायज्ञ, पूर्णाहुति हवन के पश्चात दोपहर साढ़े बारह बजे भव्य समापन शोभा यात्रा के पश्चात मुनि श्री की मंगल देशना का आयोजन किया गया।
इस संबंध में जानकारी देते हुए प्रवक्ता विमल जैन ने बताया कि भगवान आदिनाथ का पंच कल्याणक महोत्वस का आयोजन किया जा रहा था, वैसे तो भगवान यानी जो केवल ज्ञान को प्राप्त हो गये और जन्म मरण का अभाव कर चुके जीव (आत्मा) हैं। भगवान होने के लिये तीर्थंकर होना जरूरी नहीं है परन्तु सभी तीर्थंकर भगवान जरूर होते हैं। सामान्य भगवान और तीर्थंकर भगवान गुणों की, पद, प्रतिष्ठा और मोक्ष की अपेक्षा कोई अंतर नहीं होता है।
गर्भ कल्याणक-माता के गर्भ में आने के 6 माह पूर्व से ही रत्नों की वर्षा होने लगती है, जहां भविष्य में जन्म होने वाला है, उसके आसपास कोसो, योजनों दूर दूर तक दुर्भिक्ष, अकाल आदि नहीं पड़ता। सब दूर सुकाल सुख शान्ति रहती है। जो इस बात का सूचक होता है। कि कोई दिव्य भव्य आत्मा अवतरित होने वाली है। बालक जब गर्भ में रहता है तब माता को 16 स्वप्न आते हैं जिनका फल यह होता है कि महापुरूष का जन्म होना सुनिश्चित है।
जन्म कल्याणक-जन्म होने तक जो पंचाश्चार्य गर्भ से 6 माह पूर्व से प्रारम्भ हुए थे, वे निरन्तर रहते हैं याने कुल 15 माह तक होते रहते हैं। जब जन्म होता है तब उस बालक का जन्मोत्सव मनाने स्वर्ग से सौधर्म इन्द्र परिवार के साथ आते हैं और सुमेरू पर्वत पर ले जाकर बालक का अभिषेक करते हैं। उपरोक्त दोनों कल्याणकों सुनिश्चित रहता है कि वो बालक इसी भव में तीर्थंकर भगवान बनने वाले है,तो समूचा मानव समाज और प्रत्येक जीव, पंथ, संत, ग्रंथ, सम्प्रदाय, जाति आदि की ग्रंथि से ऊपर उठकर सब के कल्याण की भावना से भगवान के जन्म कल्याणक को उत्साह, उमंग से इन्द्र-इंद्राणी बालक तीर्थंकर की शोभायात्रा निकालकर अंत में सुमेरूपर्वत के पाण्डुकशिला पर विराजमान कर सोधर्म इन्द्र के रूप में अभिषेक कर कृत कृत्य होते हैं।
तप कल्याणक-जब वह जीव आत्म कल्याण के लिए दिगम्बर मुद्रा धारण कर घर परिवार और राज पाट आदि से नाता तोड़कर वैराग्य धारणकर संसार का त्याग कर वन की और गमन कर जाते हैं और आत्म ध्यान में लीन हो जाते हैं। तब तप कल्याणक मनाया जाता है।
केवलज्ञान कल्याणक-तप के द्वारा अपनी आत्मा में ही निरंतर लीन रहने एवं 4 घातिया कर्मो का नाश कर, अनंत चतुष्टय अनंत दर्शन, अनंतज्ञान, अनंत सुख और अनंतवीर्य के धारी होने से उन्हें केवल ज्ञान की प्राप्ति हो जाती है उनके ज्ञान में तिनो काल (भूतकाल – वर्तमानकाल और भविष्यकाल) के तीनों लोक के समस्त पदार्थ युगपत झलकने लगते हैं तब ज्ञान कल्याणक मनाया जाता है।
मोक्ष कल्याणक-जब वह जीव हमेशा हमेशा के लिये सब कर्मों से मुक्त होकर भगवान हो जाते हैं, उसे मोक्ष कल्याणक कहते हैं। तीर्थंकर भगवान को छोड़कर बाकी केवली भगवान के तीन कल्याणक होते है, तप, केवलज्ञान और मोक्ष तीर्थंकर भगवान का ही समवशरण होता है, अन्य केवली भगवान का नही होता है।
भवदीय
विमल जैन प्रवक्ता-9826088559

Mukesh Mehta
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